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मई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वीरांगणा रत्नावती ने बंदी बनाया था मलिक काफूर को

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#एक_सफल_विजेता_वीरांगणा_रत्नावती यह घटना अल्लाउद्दिन खिलजी के समय की है.... जब अल्लाउद्दिन खिलजी के जैसलमेर आक्रमण के समय राजकुमारी रत्ना ने जैसलमेर दुर्ग कि रक्षा की....और सेनापति मलिक काफूर को बंदि बनाया..  "....मरुप्रदेश के महाराज रत्नसिंह के सदा खिले रहने वाले मुख मंडल पर आज चिंता को रेखाएं पड़ी हुई थी । वे किसी गहन चिंतन में निमग्न थे । कोई समस्या ग्रंथि बन कर उनके मस्तिष्क को चुनौती दे रही थी । उन्हें अपने भरे - पूरे जीवन में एक अभाव खटक रहा था । जब वे समस्या को सुलझा नहीं सके तो उनके मुँह से दीर्घ निःश्वास निकल गयी । उसी समय उनको एकमात्र पुत्री #राजकुमारी_रत्ना ने उनके कक्ष में प्रवेश किया । अपने पिता के मुख से निकला यह दीर्घ निःश्वास और चिंतित मुख मुद्रा देखकर रत्ना गहरे सोच में पड़ गयी ।" उसने अपने पिता से पूछा- " महाराज ! किस सोच में डूबे हैं आप । क्या मुझे उस समस्या का सुनने का अधिकार नहीं है जो आपको व्यथित किए हुए है । " " कुछ नहीं राजकुमारी । " " नहीं महाराज , कुछ तो है , आपको मेरी सौगंध जो आप मुझसे कुछ छिपाएं । " " हमारे गुप्तच...

एक अमर बलिदानी वीरांगणा राणी सारंधा

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#भारत_की_एक_अमर_बलिदानी "#वीरांगणा_राणी_सारंधा".........  बुंदेलखंड के महाराज रुद्रप्रताप के वंशज ओरछा नरेश चंपतराय जब से गद्दी पर आसीन हुए अपने बाहुबल से राज्य का विस्तार करते जा रहे थे । उन्होंने मुगल बादशाह शाहजहाँ को कर देना बंद कर दिया था । मुगल सेनाएं आक्रमण करती पर उन्हें मुंह की खाकर वापस लौटना पड़ता । नरेश चंपतराय को वीर गाथाएं बंदेलखंड के बच्चे - बच्चे की जवान पर छायी हुई थीं । उनका विवाह भी टेकड़ी के राजा अनिरुद्ध सिंह की बहन वीरव्रती सारंधा से हुआ था । सारंधा नरेश को वीरता से ही उनकी ओर आकर्षित हुई थी । चंपतराय भी ऐसी वीर हृदया पत्नी पाकर बड़े प्रसन्न हए थे । उतार - चढ़ाव हर व्यक्ति के जीवन में आते हैं । चंपतराय के जीवन में भी कुछ ऐसी परिस्थितियां आ गईं कि उन्हें मुगल बादशाह का समर्थक एवं आश्रित बनने का मन बनाना पड़ा । शाहजहाँ तो ऐसे अवसर की ताक में ही था । उसने चंपतराय का दिल्ले में भव्य स्वागत किया । उस समय कुम्हारगढ़ को जागीर स्वतंत्र थी पर शाहजहाँ उसे अपने राज्य में मिलाना चाहता था । उसने इस कार्य हेतु चंपतराय को भेजा । साहसी चंपतराय ने इस कार्य को बड़ी बहादुर...

वियतनाम और तुर्की में भी आदि अनंत सनातन का ही सनातन

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# वियतनाम और #तुर्की में भी आदि अनंत सनातन का ही सनातन ..... सनातन 🚩 की शक्ति को पहचानो व्यवस्था को परिवर्तित करों भारत का इतिहास फिर से लिखो गोहत्या बंद करो स्वदेशी अपनाकर फिर से भारत को सोने की चिड़िया बनाओ जय विश्व गुरु भारत की🙏🚩🚩🚩🚩🚩🚩🙏

महाभारत कालिन प्राकृतिक विज्ञान

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#महाभारत_कालिन_प्राकृतिक_विज्ञान...  महाभारत काल में ज्योतिष , वृक्ष विद्या , गर्भविद्या आदि विज्ञान पर्याप्त व्यापक रूप से पढ़े जाते थे , महाभारत में इस के लिये पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध होते हैं । इस लेख में महाभारत कालिन प्राकृतिक विज्ञान के कतिपय निदर्शनों को उद्धृत किया जायेगा । *️⃣ ज्योतिष - नक्षत्र विद्या भारतवर्ष की अत्यन्त प्राचीन सम्पत्ति है । वेदों में ग्रहों और नक्षत्रों के सम्बन्ध में अनेक सूक्त हैं । ज्योतिष सम्बन्धी बहुत सी बातें भारतवासियों के नैत्यिक अनुष्ठानों का अङ्ग बन गई थीं । महाभारत के समय भी साधारण प्रजा तक नक्षत्र विज्ञान की बहुत सी बातों से साधारणतया परिचित थी । आदिपर्व में द्रौपदी को द्रुपद उपदेश देता है कि “ जो सम्बन्ध रोहिणी नक्षत्र का सोम से , भद्रा का श्रवण से और अरुन्धती नक्षत्र का वसिष्ठ से है तू वही घनिष्ट सम्बन्ध अपने पति युधिष्ठिर से जोड़े रहना... " *️⃣ #महायुद्ध के समय घोर नक्षत्रों का वर्णन इस प्रकार किया गया है.. "सूर्य का राहु से ग्रस्त होना , श्वेतग्रह का चित्रा को अतिक्रमण करना , धूम केतु का पुष्य नक्षत्र में उदय होना , अङ्गारक की महानक्...

राजा भोज का बनाया भोजेश्वर शिव मंदिर

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#भोजेश्वर_मंदिर- जिसके बारे में आपको अवश्य जानना चाहिए.....  भोजेश्वर मंदिर भोजपुर में एक पहाड़ पर स्थित है।  यह मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 32 किमी दूर है।  हर साल, हजारों भक्त इस मंदिर में प्रार्थना करने और अपने मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करने के लिए आते हैं।   *️⃣ आइए एक नजर डालते हैं भोजेश्वर मंदिर के कुछ चौंकाने वाले तथ्यों पर।   ☯️मंदिर का निर्माण धार के सम्राट, प्रसिद्ध राजा भोज ने 1010 ईसा पूर्व और 1055 ईसा पूर्व के बीच किया था। धारेश्वर भोज द्वारा निर्मित होने से ही यह भोजेश्वर नाम से जाना जाता है।    ☯️यहां रखा गया शिवलिंग एकल पत्थर से बना है और 18 फीट लंबा है।  और इसका व्यास 7.5 फीट है।   ☯️माना जाता है कि मंदिर के पीछे एक ढलान है जिसका उपयोग निर्माण के लिए पत्थरों को लुढ़काने के लिए किया जाता है।  यह कहा जाता है कि दुनिया में किसी अन्य समान संरचना में विशाल परिसरों के निर्माण के लिए यह तकनीक उपलब्ध नहीं है। ☯️यह अधूरा मंदिर अगर पूरा होता तो भगवान शिव के सबसे बड़े मंदिरों में से एक हो सकता था।  । ☯️ इस मंदिर की स...

जब गुरूकुल तोड़े जा रहे थे......

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जब गुरूकुल तोड़े जा रहे थे...... ➡️ जिस प्रकार प्राचीन काल ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी  में शक विरूद्ध स्वतंत्रता संग्राम में शको से लढते हुए विक्रमादित्य स्वतंत्रता के नायक मालवगणमुख्य थे और व्यास पीठ पर कालिदास, वराहमिहिर, आदि आचार्य ही थे, ➡️ जैसे चंद्रगुप्त मौर्य के अखंड भारत संग्राम में व्यास पीठ पर आचार्य चाणक्य थे, गुरुकुल था....  ➡️जब छत्रपति शिवाजी महाराज मुगलों से लढे तब भी व्यसपीठ पर गुरूकुल था.. समर्थ रामदास के मार्गदर्शन में.......  ➡️वैसे ही 1857 के क्रांति में राजा महाराजा और नायक  थे तो उसकाल में गुरूकुल और आर्य परंपरा ही व्यास पीठ पर थी....  लेकिन आज व्यासपीठ और शासक का तालमेल नहीं है अतः वैदिक सत्य सनातन धर्म की हानी हो रही है...  19 वीं शताब्दी का वह दौर तब सरकार एडी चोटी का जोर लगा रही थी.... गुरूकुल जलाकर कयी महत्वपूर्ण पुस्तकों को नष्ट कर रही थी.... तब गुरूकुल शिक्षा पध्दति को खत्म करने के लिए अंग्रेजी अंग्रेजों के द्वारा अपनी विदेशी शिक्षा पद्धति चालू करके भारतीय युवकों के मस्तिष्क पर डाले जा रहे गहरी गुलामी के संस्कारों के मायाजाल को विश...

आर्य गौरव का अलबरूनी को आभास

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#भारतीय_इतिहास_का_गौरवगाण_विदेशी_इतिहास___वेत्ताओं_के_अनुसार (१.) आर्य - गौरव का अलबरूनी को आभास - - बहुत दिन की बात नहीं । नौ सौ वर्ष से कुछ पहले की घटना है । खीवा वासी महम्मद - बिन - अब रिहां - अलबेरूनी अपनी अरबी पुस्तक #अलकिताब - उल - हिन्द में लिखता है - - . . . . . . . "उन ( हिन्दुओं ) के जातीय जीवन की कुछ विशेषताएं जो उन में गहरी निहित है , प्रत्येक ( विदेशी ) के लिए स्पष्ट हैं , . . . . . . . . " हिन्दू विश्वास रखते हैं , उनके देश से बढ़ कर कोई देश नहीं , उन की जाति के समान कोई जाति नहीं , उन के राजाओं के समान कोई राजा नहीं , उनके धर्म के समान कोई धर्म नहीं , उन के ज्ञान के समान कोई ज्ञान नहीं । इति । #अलबेरूनी के काल में आर्यों का जो विश्वास था वह सौ दो सौ वर्ष में नहीं बना था । उसका आधार वह इतिहास था जो सृष्टि के आदि से चला आ रहा था । उस काल के आर्य यद्यपि हीन दशा में आ चुके थे , परन्तु उनका आत्मगौरव का भाव अक्षुण्ण - रूप से स्थिर था । विदेशी मुसलमान अलबेरूनी को यह बात अच्छी नहीं लगी । (२.) मुगल सम्राट अकबर का मन्त्री #अब्बुल_फजल हिन्दू चरित्र के विषय में "आईन -...

भोज बनाम महमूद गजनवी

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#भोज_बनाम_महमूद_गजनवी  इतिहासकारों के अनुसार धारेश्वर भोज भारत का पहला हिन्दु राजा था जिसने विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों को इस देश में पांव जमाने नही दिये । अफगानिस्तान के गजनबी ने जब - जब आक्रमण किया , भोज ने उसे देश की सीमाओं के बाहर खदेड़ा । सर्वप्रथम भोज ने वर्ष १००८ ई . में लाहौर के नृपति शाही आनंदपाल को सुल्तान महमूद गजनवी के आक्रमण का मुकाबला करने अपनी सेना भेजी । इसी तरह उसके पुत्र त्रिलोकपाल जो वर्ष १०१९ - २० ई . में लाहौर का शासक था उसे भी अपनी सेना भेजी एवम् भोज ने गजनवी के आक्रमणों को नाकामयाब किया ( धार गजेटियर ) . गर्दीजी कृत " जैनुल अखबार " के विवरण अनुसार वर्ष १०२४ - १०२६ ई . में महमूद गजनवी ने भारत पर दोबारा आक्रमण किया । वह जैलसमेर , मारवाड , गुजरात मार्ग से आगे बढ़ा । गुजरात के चालुक्य नरेश भीम प्रथम की सेना गजनवी के सैन्यबल के सामने टिक न सकी और उसने सोमनाथ मंदिर की तोड़फोड़ कर खुब लूट - पाट मचायी । किन्तु राजा भोज की विशाल सेना की खबर सुनते ही वह सिंध के रास्ते रेगिस्थान होते हए वापस अफगानिस्थान लौट गया । उसे वापसी में अपनी सेना एवम् पशुओं की भारी प्...

नाम का क्या महत्व है ?

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#नाम_का_क्या_महत्त्व_है.... .... वैष्णव मत में नाम की बड़ी महिमा बताई गई है , और गोस्वामी तुलसीदासजी ने तो नाम को ही सब कुछ कह दिया है । धर्म शास्त्र में तो यहाँ तक आज्ञा दी है कि यदि किसी कन्या का नाम बुरा हो , तो उसके साथ कमी विवाह मत करो । इस का आशय यह भी है कि कोई  मनुष्य अपने बच्चों का नाम बुरा न रक्खे । (१) सम्राट नेपोलियन एक बार अपने पक्ष की अतुल सेना देखकर साहस हीन हो गया था , पर ज्योही उसको अपने नाम का ध्यान आया तो उसके हृदय में , वीर रस की तरंगे उठने लगी । और थोड़ी सी  सेना से ही शव को परास्त कर दिया । (२) चित्तौड़गढ़ के महाराना केवल #सूर्यवंश के नाम पर ही जान को हथेली पर धरे रहते थे । (३) गुरुगोविन्दसिंहजी इस नाम के महत्व को भली प्रकार जानते थे , उन्होंने जहाँ सिक्खों में जीवन दान देने के अनेक उपाय किये उनमें सब से प्रथम नाम को जानकर ही , सिक्खों का नाम सिंह रख दिया था । (४) आप के सामने दो मनुष्य समान आयु और बल वाले खड़े हैं , आप को पूछने पर जब यह ज्ञात होगा कि इन में से एक मनुष्य राजपुत्र है , तो उसके प्रति आपके हृदय में और ही कुछ भाव उत्पन्न हो जायेंगे । इसका कारण ...

सम्राट विक्रमादित्य के चिन्हों को नष्ट कर दिया था विदेशी आक्रांताओं ने

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सम्राट विक्रमादित्य के चिन्हों को नष्ट कर दिया था विदेशी आक्रांताओं ने चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के साक्ष्यों को कालांतर से अनेक परिप्रेक्ष्य में देखें तो देश काल और परिस्थिति के नुसार उनके सनष्ट होने के क्रम प्रमाण दृष्टिगोचर होते हैं। सरलतम तरिके से निर्मित किए गए मंदिर और प्रासाद आदि नष्ट करने के लिए मुस्लिम आक्रांताओं ने तो बड़ा नाम कमाया है। भारत के मंदिरों के जगह मस्जिद बनाने के लिए वे प्रसिद्ध रहे। लुटना ही इस्लाम की सिख है और यही उनकी जन्नत! फिर आते हैं दृतिय दृष्टिकोण पर... इसके अनुसार कयी इतिहासकार मानते हैं कि हुणों के आक्रमण काल में लुटपाट का चक्र बड़ा लंबे अर्से से रहा। जिसमे अभी पिछले दिनों पीएम मोदी जी की सरकार द्वारा  भारत की नटराज की मूर्ति पुन्ह भारत लाने की घटना ऐसे ही ऐतिहासिक लुटपाट की घटनाओं का प्रासंगिक उदाहरण कहना चाहीए। और एक किए है तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्व विज्ञालयों के अरबों खरबों की संख्या से भी अधिक पांडुलिपियाँ और ग्रंथ जलकर बर्बाद हो जाना। तृतीय है मैकाले और मैक्समूलर (जर्मन विद्वान जिसे अंग्रेजी और संस्कृत बखूबी आती थी) , जैसे अंग्रेज जिन्हो...

जानिए पोवार गौरव अवन्तिनायक शिवभक्त महाराजा श्रीभोजदेव की टॉप टेन उपाधियाँ

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मालवनरेश भोज का व्यक्तित्व इतना महान और बलाढ्य था कि उन्हें कवियों, विद्वानों जनश्रृतियो ने अनेकों उपाधियों से अलंकृत किया। परमार चक्रवर्तीय सम्राट महाराजा भोज की सर्वोत्तम अग्रीम दस उपाधियाँ और उनके पीछे का कारण अर्थात् क्यों उपाधि अभिप्राप्त हुई इसका अवलोकन और सार्थकता : (१) कविराज :- उनके दरबार में 500 से अधिक विद्वान थे और सम्राट भोज संस्कृत के महानतम् विद्वान थे। उन्होंने अनेकों विद्वानों को आश्रय प्रदान किया क्योंकि वे कवि और विद्वानों का, विज्ञान (विद्या)  का सम्मान करते थे। संस्कृत के सिध्दहस्त श्रीभोज निष्णात  संस्कृत कवि भी थे। बहुत कम आयु में चम्पू पद्य रचना में उन्होंने चम्पू रामायण की भी रचना करके विद्वानों को चकित कर दिया था। कालिदास नामक कवि भी उनके दरबार में शोभा पाते थे। अतः उनका स्थान कवियों में राजा के भांति था। कवि राजा मुंज की परंपरा को उन्होंने भी आगे बढाया। इसलिए उन्हें भी समुद्रगुप्त की ही भांति #कविराज  कहाँ गया। (२) नवसाहसांक :- इसका अर्थ होता है "नया विक्रमादित्य।" सम्राट भोज की तुलना यदि किसी से कि जा सकती है तो वह है सिर्फ चक्रवर्ती विक्रमादित...

आदि शंकराचार्य का वास्तविक जन्म का समय

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# जानिए_आदि_शंकराचार्य_का_वास्तविक_काल... (वामपंथी इतिहासकारों द्वारा फैलाये भ्रम का खँडन) हिन्दू धर्म को पुन:व्यवस्थित करके आदिकाल से चली आ रही संत धारा को पुनर्जीवित करने का श्रेय आद्य या आदि शंकराचार्य को जाता है। कहते हैं कि उनका जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था।  आदि शंकराचार्य का जन्म समय : आज के इतिहासकार कहते हैं कि आदि शंकराचार्य का जन्म 788 ईस्वी में हुआ और उनकी मृत्यु 820 ईस्वी में। मतलब वह 32 साल जीए। इतिहासकारों का यह मत तथ्यों से मैच नहीं होता है। अत: उनका मत असिद्ध हैं। दरअसल, 788 ईस्वी में एक अभिनव शंकर हुए जिनकी वेशभूषा और उनका जीवन भी लगभग शंकराचार्य की तरह ही था। वे भी मठ के ही आचार्य थे। उन्होंने चिदंबरमवासी श्रीविश्वजी के घर जन्म लिया था। उनको इतिहाकारों ने आदि शंकराचार्य समझ लिया। ये अभिनव शंकराचार्यजी कैलाश में एक गुफा में चले गए थे। ये शंकराचार्य 45 वर्ष तक जीए थे। लेकिन आदि शंकराचार्य का जन्म केरल के मालाबार क्षेत्र के कालड़ी नामक स्थान पर नम्बूद्री ब्राह्मण शिवगुरु एवं आर्याम्बा के यहां हुआ था और वे 32 वर्ष तक ही जीए थे। दुसरे देशों की किंवदन्ती को भी इतिह...

बौध्द कालिन व्यापार और नौका नयन

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#बौध्द_कालिन_व्यापार_और__नौका_नयन.. . आर्यावर्त में बौद्ध पूर्व भारत में समुद्र यात्राओं का वर्णन हमने ""क्या हिंदू या आर्य सागर पार नहीं जाते थे?"" नामक लेख में देखा।¶ अब हम इस लेख में बौध्द कालिन आर्यावर्त की चर्चा करेंगे.... "बौद्धः साहित्य" के अनुशीलन से उस समय के व्यापार तथा नौका नयनः : में अनेक महत्वपूर्ण और मनोरञ्जक बातें ज्ञात होती हैं । उस समय : के सम्बन्ध में भारत के व्यापारी महासमुद्र को पार कर दूर दूर देशों में व्यापार के लिये जाया करते थे । समुद्र को पार करने के लिये जहान बहुत बड़ी संख्या में बनते थे . और उस समय में जहाज बनाने का व्यवसाय अत्यन्त उन्नत दशा में था । ( १) समुद्द वणिज जातक में एक जहाज का उल्लेख है , जिन में वर्धकियों के सहन्त्र परिवार बड़ी सुगमता के साथ बैठः कर सुदूरवर्ती किसी द्वीप में चले गये थे । वर्धकियों के ये एक सहस्र परिवार ऋण के बोझ से बहुत दबे हुवे थे और अपनी दशा से असन्तुष्ट होने के कारण इन्होंने यह निश्चय किया था कि किसी सुदूर प्रदेश में जाकर बस जावें ।[1] 'सचमुच वह जहाज बहुत विशाल होगा , जिस में एक हजार परिवार सुगम...

यज्ञ चिकित्सा

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#यज्ञ_चिकित्सा इतनी सरल और उपयोगी है कि उसके आधार पर मारक और पोषक दोनों ही तत्वों को शरीर में आसानी से पहुंचाया जा सकता है । यों यज्ञ विज्ञान के अनेक पक्ष हैं इनमें एक रोगोपचार भी है । मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य को अभिवृद्धि के साथ - साथ शारीरिक रोगों के निवारण में भी उससे ठोस सहायता है । #औषधि_उपचार में शरीर के विभिन्न अवयवों तक पदार्थको पहुंचाने का माध्यम #रक्त है । रक्त यदि दूषित निर्बल हो तो यह प्रेषित उपचार पदार्थ ठीक तरह परिवहन नहीं कर सकता । फिर एक कठिनाई और भी हैं कि रक्त में रहने वाले स्वास्थ्य प्रहरी श्वेत कण किसी विजातीय पदार्थ को सहन नहीं करते उससे लड़ने - मरने को उधार खाये बैठे रहते हैं । औषधि जब तक कम रोग कीटाणुओं पर आक्रमण होने इन स्वास्थ्य प्रहरियों से ही महाभारत करना पड़ता है । बीमारी पर आक्रमण होने पर प्रयुक्त औषधि और स्वास्थ्य कण ही आपस में भीड़ जाते हैं । और यह नया विग्रह ओर खड़ा हो जाता है पेट की पाचन क्रिया रक्त में उन्हीं पदार्थो को सम्मिलित होने देती है जो शरीर संरचना के साथ तालमेल खाते हैं । इसके अतिरिक्त जो बच जाता है । वह विजातीय कहा जाता है । और उसे कूल , मू...