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अन्याय कितना सहे?

 2.5.2024          यह संसार है। यहां मनुष्य पशु पक्षी कीड़े मकोड़े जंगली एवं समुद्री जीव जंतुओं के रूप में असंख्य जीव रहते हैं। कोई छोटा, कोई बड़ा। कोई कमजोर, कोई बलवान। कोई अधिक बुद्धिमान, कोई कम बुद्धिमान। "ये जीव स्वार्थ के कारण अथवा अविद्या के कारण एक दूसरे पर आक्रमण भी करते रहते हैं। इसलिए यहां अपनी अपनी रक्षा के लिए संघर्ष करना और अपनी रक्षा करना सबके लिए अनिवार्य है।"           "जो जीव विद्या बल बुद्धि आदि में बलवान होता है, वह इन गुणों की सहायता से अपनी रक्षा कर लेता है। वह जीवित और सुरक्षित रहता है। और जिसके पास विद्या बल बुद्धि आदि गुण कम होते हैं, वह कमजोर पड़ जाता है। वह संसार में बहुत मार खाता है, और अन्त में नष्ट हो जाता है।"         "यदि आप इस संसार में ठीक ढंग से जीना चाहते हों, तो आपको भी ईश्वर की कृपा से वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन कर के, माता-पिता और गुरुजनों के अनुशासन में रहकर अपनी विद्या बल बुद्धि आदि को बढ़ाना होगा। तभी सही ढंग से आपके जीवन की रक्षा हो पाएगी।"         ...

दृष्ट व्यक्ति की परिभाषा...

 21.2.2022.         "दुष्ट व्यक्ति की परिभाषा यह नहीं है, कि 'जिसके साथ आपका विचार नहीं मिलता, वह दुष्ट है।' यूं तो आप और वह दोनों दुष्ट कहलाएंगे। क्योंकि दोनों का विचार आपस में नहीं मिलता। वास्तव में दुष्ट का अर्थ है, 'जो ईश्वर के संविधान के विरुद्ध आचरण करे, वह दुष्ट है।' ईश्वर का संविधान है, वेद। वेदों की व्याख्या ठीक ठीक की है, ऋषियों ने। अतः "जो वेदों और ऋषियों के शास्त्रों के विरुद्ध विचार रखता है, उनके विरुद्ध भाषा बोलता है, और उनके विरुद्ध आचरण करता है, वह दुष्ट है। वेदों और ऋषियों के ग्रंथों में जो सभ्यता और मानवता बताई गई है, जो व्यक्ति उसके विरुद्ध आचरण करे, वह दुष्ट है।"         प्रत्येक व्यक्ति के विचार अलग-अलग होते हैं। इसके अनेक कारण हैं। "उनके पूर्व जन्मों के संस्कार अलग-अलग होते हैं। सब के माता पिता परिवार पड़ोस शिक्षा पद्धति सिलेबस खानपान इत्यादि में भी अंतर होता है, जिससे उनके विचारों में भिन्नता आ जाती है।"           "संसार में सब लोग दुष्ट नहीं होते।" यदि 100 में से 80 व्यक्ति वेदादि शास्त्रों के ...

अन्याय होनेपर क्या करें?

 25.1.2023         "यह संसार है। यहां किसी को भी पूरा पूरा न्याय नहीं मिलता। सबके साथ कभी न कभी, कहीं न कहीं, थोड़ा या अधिक, अन्याय होता ही है।" यहां तक कि मूर्ख और दुष्ट लोग तो ईश्वर को भी नहीं छोड़ते। "सर्वथा निर्दोष ईश्वर पर भी बहुत से झूठे आरोप लगाते हैं।" जबकि वह ईश्वर सदा सबका भला चाहता है, और करता है। सदा सबके साथ न्याय ही करता है। "ईश्वर ने आज तक कभी भी, किसी के साथ भी, एक बार भी, अन्याय नहीं किया। और न ही कभी भविष्य में करेगा। फिर भी वह मूर्खों और दुष्टों के अन्याय से नहीं बच पाया।" "संसार में बहुत से लोग ऐसे सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान न्यायकारी दयालु आनन्दस्वरूप सर्वथा निर्दोष ईश्वर पर भी झूठे आरोप लगाते हैं। यह ईश्वर के साथ अन्याय ही तो है।"         "जब लोग सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान न्यायकारी दयालु आनन्दस्वरूप सर्वथा निर्दोष ईश्वर पर भी दोष लगाते हैं, तो आपको और हमें कौन छोड़ेगा?" आपकी हमारी तो क्या शक्ति है? क्या विद्या है? क्या ज्ञान है? क्या बल सामर्थ्य है? बिल्कुल न के बराबर। "तो ऐसी स्थिति में आप दुखी न हों। यह तो सदा मानकर ही...

मुर्ख व दृष्ट लोग...

 9.10.2023          "संसार में भौतिक पदार्थ भी कुछ सुख देते हैं। जैसे भोजन वस्त्र मकान मोटरगाड़ी रेडियो टीवी कंप्यूटर पंखा कूलर एयर कंडीशनर इत्यादि।" "इनके अतिरिक्त कुछ मनुष्य भी आप को सुख देते हैं। जैसे माता-पिता भाई-बहन पति-पत्नी मित्र संबंधी व्यापारी ग्राहक इत्यादि।" "इनके अतिरिक्त जो कुछ पालतू पशु होते हैं, वे भी थोड़ा-थोड़ा सुख देते हैं। जैसे कुत्ता खरगोश तोता गाय बकरी इत्यादि।"          इनमें से जो मनुष्य लोग हैं। वे भी कई प्रकार के हैं। "कोई कम बुद्धिमान हैं, कोई मध्यम स्तर के हैं, और कोई तीव्र बुद्धि वाले भी हैं। कोई ईमानदार हैं, कोई सामान्य स्तर के हैं, और कोई-कोई मूर्ख और धोखेबाज दुष्ट भी हैं।"            "मनुष्यों में से जो मूर्ख और दुष्ट हैं, वे चाहे आपकी योग्यता को समझते हैं या नहीं समझते, दोनों स्थितियों में वे तो आपको अनेक प्रकार से दुख देंगे ही।" कुछ दूसरे लोग जो ईमानदार होंगे, वे आपकी योग्यता को समझ कर आपको सुख देंगे।"           अतः अपने आसपास रहने वाले लोग...

सज्जन कैसे करें दृष्ट से व्यवहार?

 2.11.2022         संसार में कुछ लोग अच्छे होते हैं, ईमानदार होते हैं, सज्जन होते हैं। और कुछ लोग बेईमान धोखेबाज एवं दुष्ट होते हैं। दोनों में अंतर यह होता है, कि "अच्छे ईमानदार सज्जन लोग कभी किसी को परेशान नहीं करते, किसी पर अन्याय नहीं करते। दूसरे दुष्ट बेईमान लोग भले ही उन्हें परेशान कर दें, तब भी वे उनके साथ झगड़ा नहीं करते। हां, अपनी रक्षा के लिए इतना तो कर लेते हैं, कि दुष्ट बेईमान असभ्य धोखेबाज लोगों से वे दूर हो जाएं। परंतु बेईमान धोखेबाज लोगों से वे कोई बदला नहीं लेते। उन पर अन्याय कभी नहीं करते। उस सारी घटना को ईश्वर के न्यायालय में छोड़ देते हैं। यही उनकी विशेषता होती है।"         "ईश्वर तो न्यायकारी है ही। वह तो सदा सब को देखता ही है। सबके कर्मों का हिसाब रखता ही है। और ठीक समय आने पर सब को न्यायपूर्वक कर्मों का अच्छा बुरा फल देता ही है। यह वास्तविकता है।" वे अच्छे सज्जन लोग इस वास्तविकता को अच्छी प्रकार से समझते हैं। इसलिए वे ऐसा सोचते हैं, कि "जब इस दुष्ट अन्यायकारी का दुर्व्यवहार ईश्वर देख ही रहा है, मैंने इससे अपनी रक्षा करने ...

सुख से जीना..

 21.7.2023        "प्रत्येक व्यक्ति सुख से जीना चाहता है। दुखी होना कोई भी नहीं चाहता।" यह एक नियम है। इस नियम के अनुसार किस प्रकार से आप अपने जीवन को सुखी बना सकते हैं? उसके उपाय इस प्रकार से हैं।         "आपके जीवन में भूतकाल में आप के साथ जो अन्याय हुए हैं, जो दुखदायक घटनाएं हो चुकी हैं, उन घटनाओं को बार-बार याद न करें। क्योंकि ऐसा करने से आपका दुख बढ़ेगा।" बार-बार उन्हें याद न करने का उपाय है, कि "आप खाली न बैठें। किसी न किसी काम में व्यस्त रहें। इस से आप पुरानी दुखदायक घटनाओं को याद नहीं करेंगे।"       "और फिर भी कभी आप फुर्सत में हों, जब आपके पास कोई विशेष कार्य न हो, तब आपके जीवन में जो भूतकाल में अच्छी घटनाएं हो चुकी हैं, जैसे कि आपको कभी धन मिला, कभी सम्मान मिला, कभी कोई मेडल मिला, कोई यात्रा करने का अच्छा अवसर मिला इत्यादि, तो उन घटनाओं को आप याद करें। इससे आपका मन प्रसन्न रहेगा।"          वर्तमान में जो कुछ परिस्थितियां चल रही हैं, उनको हृदय से स्वीकार करें। अर्थात "वर्तमान में जो लोग आपको सह...

विज्ञान...

"विज्ञान=पृथ्वी से लेके परमेश्वर पर्य्यन्त पदार्थों को विशेषता से जानकर उन से यथायोग्य उपयोग लेना!"                          - महर्षि दयानंद सरस्वती                              (सत्यार्थप्रकाश समु. ४) 

धर्म और ईश्वर...

 8.1.2022.         "संसार में यदि सबसे अधिक उलझा हुआ कोई विषय है, तो वह धर्म और ईश्वर है।"         धर्म के बिना ईश्वर नहीं पहचाना जा सकता, और ईश्वर के बिना धर्म नहीं पहचाना जा सकता। इन दोनों का साथ वैसा ही है जैसे सूर्य और प्रकाश का साथ।       जैसे सूर्य के बिना प्रकाश नहीं रह सकता और प्रकाश के बिना सूर्य नहीं कहलाता। इसी प्रकार से जब हम ईश्वर की बात करते हैं, तो धर्म साथ में जुड़ता ही है। अथवा जब हम धर्म की बात करते हैं, तो ईश्वर भी साथ में जुड़ता ही है। "एक के बिना, दूसरे को समझना अधूरा है।"          जब हम धर्म की बात करते हैं, तो प्रश्न होता है, कि धर्म क्या है? उत्तर -- "जो सबके कल्याण के लिए ईश्वर का बताया हुआ संविधान है। जिसका पालन प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए, वह 'धर्म' है।" ईश्वर ने जो संविधान बताया है, उसका नाम 'चार वेद' है। अर्थात ईश्वर के बताए संविधान - वेदों के अनुसार 'आचरण' करने का नाम 'धर्म' है।" केवल वेदों की पुस्तक पढ़ लेना, सुन लेना या सुना देना मात्र, पूरा धर्म नहीं है। "वह भी धर्म ह...

क्या आत्मा की सत्ता है?

 4.4.2020. *प्रश्न --- क्या आत्मा की सत्ता है?* *उत्तर -- जी हाँ, है।* कैसे? संसार में कुछ नियम हैं, जिनमें से एक नियम है , कि *कोई भी गुण, बिना द्रव्य के नहीं रहता.*  (जो तत्त्व गुणों को धारण करता है, उसे द्रव्य कहते हैं. और द्रव्य जिस विशेषता को धारण करता है, उसे गुण कहते हैं।) जैसे *गर्मी* एक गुण है। इसे *अग्नि* नाम का द्रव्य धारण करता है। अर्थात गर्मी, अग्नि में रहती है , उससे दूर अलग नहीं रह सकती। जहां भी गर्मी होगी , वहां पर अग्नि तत्त्व अवश्य होगा। कहीं स्थूल रूप में और कहीं सूक्ष्म रूप में । जैसे, चूल्हे में अग्नि जलती है, उसकी लपटें दिखती हैं, यह स्थूल है, दिखाई देती है।  पर भट्ठी में एक लोहे की रॉड गर्म कर दी जाए और बाहर निकाल के रख दी जाए, तो उसमें गर्मी भी है अग्नि भी है, परंतु वहां स्थूल रूप में लपटें नहीं दिखती। सूक्ष्म रूप में वहां दोनों हैं। अग्नि भी है, और गर्मी भी है।  इस उदाहरण से पता चला, कि कोई भी गुण बिना द्रव्य के नहीं रहता। एक और दूसरा नियम - *जैसे गुण कारण द्रव्य में होते हैं, वैसे ही कार्य द्रव्य में उत्पन्न होते हैं। जो गुण कारण द्रव्यों म...

समय...

 13.5.2021.       *हाथ से गया समय फिर वापस नहीं आता। समय बीत जाने के बाद व्यक्ति अधिकतर पश्चाताप ही करता है।*          बाल्यावस्था में व्यक्ति खेलकूद में अपना समय खो देता है। किशोर अवस्था में पढ़ाई का बोझ रहता है। युवावस्था में धन कमाने की चिंता और घर चलाने का तनाव रहता है। प्रौढ़ अवस्था में समाज के भी कुछ काम करने पड़ते हैं। फिर 50 55 वर्ष की आयु के बाद वृद्धावस्था आरंभ हो जाती है। तब व्यक्ति का ज्ञान कुछ परिपक्व होता है, और जीने का ढंग समझ में आता है। तब तक शरीर में शक्ति बहुत घट जाती है। उस समय व्यक्ति अपने जीवन भर के अर्जित ज्ञान से कुछ विशेष कार्य करना चाहता है। अपनी कुछ आध्यात्मिक उन्नति करना चाहता है। कुछ व्यायाम ध्यान उपासना स्वाध्याय सत्संग आदि करना चाहता है। परन्तु तब तक शरीर और इंद्रियां ढीली हो जाती हैं, इस कारण वह कुछ विशेष कर नहीं पाता, और बस केवल पश्चाताप ही करता है, कि *यह जीवन तो अब बीत गया, शक्ति रही नहीं, अब तो अगले जन्म में ही कुछ करेंगे.* इस प्रकार से पश्चाताप करता हुआ व्यक्ति, चाहते हुए भी कुछ विशेष कार्य नहीं कर पाता, औ...

किसी भी व्यक्ति से संबंध तोड़ने में जल्दबाजी न करें

किसी भी व्यक्ति से संबंध तोड़ने में जल्दबाजी न करें। कभी ऐसा न हो, कि बाद में आपको पछताना पड़े।         मनुष्य सामाजिक प्राणी है, इसलिए वह अकेला नहीं जी सकता। उसे दूसरों का सहयोग लेना ही पड़ता है। इसीलिए लोग एक दूसरे से संबंध बनाकर रखते हैं, ताकि समय आने पर वे एक दूसरे से लाभ ले दे सकें।        सब लोगों का स्वभाव भी एक सा नहीं होता। क्योंकि सब के विचार, पूर्व जन्म के संस्कार, योग्यता, बुद्धि का स्तर, खानपान, वातावरण, घर का परिवेश आदि भिन्न-भिन्न होने से सब के विचार पूरे-पूरे नहीं मिलते। जब पूरे-पूरे विचार आपस में नहीं मिलते, तो परस्पर टकराव उत्पन्न होता है। यह टकराव छोटा मोटा हो, तो लोग उसे सहन कर लेते हैं, और संबंध बनाए रखते हैं। परंतु यदि यह टकराव बड़े स्तर का हो, तो दो-चार बार सहन करने के बाद वे संबंध तोड़ देते हैं।        जब दो व्यक्ति संबंध तोड़ते हैं, तो उनमें प्रायः एक व्यक्ति न्यायप्रिय होता है, अच्छा होता है, और दूसरा अन्यायप्रिय अर्थात बुरा। इसी कारण से उनमें आपस में टकराव उत्पन्न होता है, और संबंध टूट जाता है।  ...

कृतज्ञता व कृतघ्नता...

  24.6.2021.          *"अपने आचरण को पहचानें। आप कृतज्ञ हैं? अथवा कृतघ्न?"*         *"कोई व्यक्ति आपके ऊपर कोई उपकार करे, आपको सहयोग देवे, आपका भला करे, आपकी समस्याओं को सुलझावे, आप की किसी भी प्रकार की सहायता करे। और यदि आप उसके इन उपकारों को हृदय से स्वीकार करते हैं, उसका आभार मानते हैं, धन्यवाद करते हैं, उसके साथ सभ्यता नम्रता सम्मानपूर्वक व्यवहार करते हैं, तो इसका नाम 'कृतज्ञता' है। और यदि आप इसके विपरीत व्यवहार करते हैं, तो उसका नाम 'कृतघ्नता' है।"*          कृतज्ञता ही मानवता है। यह मनुष्यता का सर्वप्रथम लक्षण है। सबसे उत्तम कर्म है। सबसे बड़ी सभ्यता है। *"जो व्यक्ति कृतज्ञता का व्यवहार नहीं करता, बल्कि इसके विपरीत कृतघ्नता का व्यवहार करता है, उसे शास्त्रों में बहुत बड़ा पापी बतलाया गया है।"*             रामायण में तो यहां तक कहा है, कि कृतघ्नता इतना बड़ा पाप है, कि इसका कोई प्रायश्चित भी समझ में नहीं आ रहा, जिसे करके व्यक्ति इसके बुरे संस्कार से छूट जाए। इसलिए कभी भी कृतघ्नता ...

संबंध कैसे रखे...

 1.1.2021        *जिसके साथ भी संबंध रखें, सच्चा संबंध रखें, दिखावा न करें। तभी आनंद होगा।*         *कुछ तो जन्म से हमारे निकट संबंधी होते हैं, जिनके साथ हम एक ही घर परिवार में रहते हैं। वे संबंध ईश्वर द्वारा स्थापित किए गए हैं। जैसे माता-पिता भाई-बहन दादा-दादी इत्यादि।* कुछ दूसरे लोग भी हमारे संबंधी होते हैं, परंतु वे एक घर परिवार में कभी रहते भी हैं और दूर भी रहते हैं। वे संबंध भी ईश्वर द्वारा ही स्थापित किए गए हैं। जैसे चाचा चाची मामा मामी बुआ फूफा मौसी मौसा आदि।          *परन्तु कुछ और लोगों के साथ भी हमारे संबंध हो जाते हैं, जो ईश्वर द्वारा नहीं बनाए जाते, बल्कि हम स्वयं बनाते हैं। जैसे मित्र, पति पत्नी, गुरु, आचार्य, पड़ोसी आदि।* इन सब लोगों के साथ मिलजुल कर हम अपना जीवन जीते हैं। एक दूसरे का सहयोग लेते हैं और एक दूसरे को सहयोग देते भी हैं। क्योंकि अल्पशक्ति वाले होने से हमें एक दूसरे का सहयोग लेना देना पड़ता है। जब सहयोग लेना देना पड़ता है, तो उनसे संबंध भी रखना पड़ता है। *जब हम इन से संबंध रखते हैं, तो पूरी ईमा...

उंचा योगी...

 8.9.2024          वेद में लिखा है, कि "उपह्वरे गिरीणां संगमे च नदीनां धिया विप्रो अजायत।" अर्थात "जो व्यक्ति ऊंचा योगी बनना चाहता है, उसे पहाड़ों की गुफाओं में नदियों के संगम पर गुरुकुलों आश्रमों आदि एकांत स्थानों में जाकर योगाभ्यास करना चाहिए, और एक जीवित शरीरधारी योग्य विद्वान व्यक्ति को अपना गुरु आचार्य स्वीकार करना चाहिए।" "क्योंकि बिना जीवित गुरु जी के कोई भी विद्या आती नहीं।"          जैसे स्कूलों कॉलेजों गुरुकुलों आदि में विद्यार्थी, गुरु जी को समर्पित होकर विद्या पढ़ते हैं। जैसा गुरुजी पढ़ाते हैं, वैसा पढ़ते हैं। उनके साथ व्यर्थ की बहस नहीं करते। तू तड़ाक नहीं करते। सभ्यता और नम्रता से पढ़ते हैं। अपने गुरुओं अध्यापकों आचार्यों को अपने से अधिक बुद्धिमान स्वीकार करते हैं। अपनी बुद्धि को उनकी बुद्धि से कम मानते हैं। उनके आदेश निर्देश का पालन करते हैं, तभी वे ऊंचे विद्वान बन पाते हैं, अन्यथा नहीं।"           "इसी प्रकार से यदि कोई व्यक्ति ऊंचा योगी बनना चाहता हो, तो इस योग विद्या को भी वह तभी सीख स...

भुख कम लगना...

APPETITE LOST : Nux Vomica 30-200 : Bitter taste, tongue coated yellow at back due to indigestion. Magnesia Carb.30 : Children refuses milk, get pain if taken.Green stools. Sour breath. China 30 : Want of appetite which returns when eating. Ignatia 30-200 : Complete loss of appetite for food or drinking. Ferrum Phos 6x-30-20 : Appetite diminished or lost. Aversion to food, milk and meat. Abdomen distended, liver and spleen enlarged. Much flatulence . Nausea and Vomitting. Abies Nigra 30 : Total loss of appetite in morning but great craving for food at noon and at night. भूख कम लगना : नक्स वोमिका 30-200 : कड़वा स्वाद, अपच के कारण जीभ पर पीछे की ओर पीले रंग की परत जम जाना। मैग्नेशिया कार्ब.30 : बच्चे दूध पीने से मना करते हैं, दूध पीने पर दर्द होता है। हरा मल। खट्टी सांस। चाइना 30 : भूख न लगना जो खाने पर वापस आ जाती है। इग्नेशिया 30-200 : खाने या पीने की पूरी तरह से भूख न लगना। फेरम फॉस 6x-30-20 : भूख कम हो जाना या खत्म हो जाना। भोजन, दूध और मांस से घृणा। पेट फूल जाना, यकृत और तिल्ली का ब...

समस्याएं...

 27.9.2024           बहुत से लोग जीवन में आने वाली समस्याओं को ऐसा मान लेते हैं, कि "बस! अब जो समस्या आई है, यह तो हमेशा बनी ही रहेगी, यह कभी हटेगी ही नहीं। संसार में इसका कोई समाधान है ही नहीं।" ऐसा विचार करना ग़लत है। और केवल इसी ग़लत विचार से वे लोग तनाव रूपी तालाब में डूब जाते हैं। यदि वह समस्या संयोगवश कुछ लंबी चल ही जाए, तो बहुत से लोग तो डिप्रेशन में भी चले जाते हैं। और डिप्रेशन में जाने के बाद तो और नई नई समस्याएं उत्पन्न होती रहती हैं।             यह सब विचारों का खेल है। "यह समस्या अब कभी हटेगी ही नहीं।" "यदि आपने ऐसा गलत विचार कर लिया, तो इसके दुष्परिणामस्वरूप आप अनेक मानसिक एवं शारीरिक रोगों से घिर जाएंगे। अतः ऐसा गलत विचार न करें।"           जीवन में जो भी समस्या आए, उसके विषय में ऐसा न सोचें, कि अब वह कभी हटेगी ही नहीं। "यदि ईमानदारी से समस्या का समाधान ढूंढा जाए, बुद्धिमत्ता से पुरुषार्थ किया जाए, समाज के बुद्धिमान लोगों तथा ईश्वर की सहायता भी ली जाय, तो कौन सी ऐसी समस्या है, जो हल...

ईश्वर की खोज...

एक प्रसिद्द संत थे। उनके सदाचारी जीवन और आचरण से सामान्य जन अत्यंत प्रभावित होते और उनके सत्संग से अनेक सांसारिक प्राणियों को प्रेरणा मिलती। सृष्टि का अटल नियम है। जिसका जन्म हुआ उसकी मृत्यु भी होगी। वृद्ध होने पर संत जी का भी अंतिम समय आ गया। उन्हें मृत शैया पर देखकर उनके भक्त विलाप करने लगे। उन्होंने विलाप करते हुए शिष्यों को अंदर बुलाकर उनसे रोने का कारण पूछा। शिष्य बोले आप नहीं रहेंगे तो हमें ज्ञान का प्रकाश कौन दिखलायेगा। संत जी ने उत्तर दिया, " प्यारे शिष्यों प्रकाश तो आपके भीतर ही हैं। उसे केवल खोजने की आवश्यकता हैं। जो अज्ञानी है वे उसे संसार में तीर्थों, नदियों, मंदिरों, मस्जिदों आदि में खोजते हैं। अंत में वे सभी निराश होते है। इसके विपरीत मन, वाणी और कर्म से एकनिष्ठ होकर निरंतर तप और साधना करने वाले का अन्तकरण दीप्त हो उठता है। इसलिए ज्ञान चाहते हो तो ज्ञान देने वाले को अपने भीतर ही खोजो। वह परमात्मा हमारे अंदर जीवात्मा में ही विराजमान हैं। केवल उसे खोजने का पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है। वेद में इस सुन्दर सन्देश को हमारे शरीर के अलंकृत वर्णन के माध्यम से बताया गया है। अ...

मैक्समूलर के विचारपरिवर्तन में महर्षि दयानन्द का प्रभाव...

मैक्समूलर के विचारपरिवर्तन में महर्षि दयानन्द का प्रभाव लेखक- स्व० पं० युद्धिष्ठिर मीमांसक मैक्समूलर के कुछ पत्र अपनी पत्नी, पुत्र आदि के नाम लिखे हुए उपलब्ध हुए हैं। पत्र-लेखक पत्रों में अपने हृदय के भाव बिना किसी लाग-लपेट के लिखता है। अतः किसी भी व्यक्ति के लिखे हुए ग्रन्थों की अपेक्षा उसके पत्रों में लिखे विचार अधिक प्रामाणिक माने जाते हैं। प्रारम्भिक विचार- मैक्समूलर के आरम्भिक काल में वेदों के सम्बन्ध में क्या विचार थे, इसके निदर्शनार्थ उसके कुछ उद्धरण नीचे देते हैं- १. सन् १८६६ के एक पत्र में मैक्समूलर अपनी पत्नी को लिखता है- "वेद का अनुवाद और मेरा यह संस्करण उत्तरकाल में भारत के भाग्य पर दूर तक प्रभाव डालेगा। यह उसके धर्म का मूल है और मैं निश्चय से अनुभव करता हूं कि उन्हें यह दिखाना कि यह मूल कैसा है, गत तीन सहस्त्र वर्ष में उससे उपजने वाली सब बातों के उखाड़ने का एक मात्र उपाय है।" २. एक पत्र में वह अपने पुत्र को लिखता है- "संसार की सब धर्मपुस्तकों में से 'नई प्रतिज्ञा' (ईसा की बाइबिल) उत्कृष्ट है। इसके पश्चात् कुरान जो आचार की शिक्षा में 'नई प्रतिज्ञा...

भजन : विठ्ठल पाहुणा आला माझ्या घरा

विठ्ठल पाहुणा आला माझ्या घरा लिंब लोन करा सावळ्याला ||धृ|| दूरच्या भेटीला बहु आवडीचा जीवन सरिता नारायण ||१|| सर्व माझे गोत्र, मिळाले पंढरी मी माझ्या माहेरी धन्य झालो ||२|| तुका म्हणे माझा आला सखा हरी संकट निवारी पांडुरंग ||३||

वेदानूकुल गीता को जानिए

श्रीमदभग्वदगीता का वैदिक उपदेश ईश्वर का स्वरूप :- • सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।। ( 13/13 )  ईश्वर सर्वव्यापक है । सब ओर उसके हाथ पैर हैं । वह सब जगह देखता और सुनता है ।  • अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्मुच्यते ।  भूतभावादोभ्दवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ।। (8/3) ईश्वर जन्म और मृत्यु से परे है । वह अवतार नहीं लेता ।  • बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ।। (13/15) ईश्वर अत्यन्तसूक्ष्म होने से बाहर की आँख आदि इन्द्रियों से जानने योग्य नहीं है । ईश्वर न आता है न ही कहीं जाता है । क्योंकि वह दूर तथा पास स्थानों पर विद्यमान है, वह निराकार होने से दिखाई नहीं देता ।  • यया धर्ममधर्म च कार्य चाकार्यमेव च ।  अयाथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ।। ( 18/13 )  हे अर्जुण ! यदि तूँ इस निराकार अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वव्यापक ईश्वर को जानना चाहता है तो अपने हृदय में ही ध्यान करके जान सकता है, क्योंकि वह बाहर नहीं मिल सकता । वह वहीं मिलता है जहाँ आत्मा भी हो, दोनों क...